रविवार, 6 मार्च 2016

उधार



उधार

 

मैं नहीं जाऊंगा

दुकान पर , मुझे तो पहचानता भी नहीं

कमबख्त दुकानदार

 

जाऊंगा

और कहूंगा उधार दो

दो किलो चावल..एक किलो प्याज

पूछेगा कौन हैं आप , तो क्या कहूंगा

बिन पहचाने

कैसे कोई दे देगा सामान

 

जाऊंगा और कहूंगा

कहूंगा कि दुकानदार महोदय

वो जो मोटी-मोटी, नाटी-नाटी

और थुल-थुल सी औरत आती है , वो जो

ले जाती है अक्सर उधार , उन्ही का पति हूं मैं

वो घर में नहीं है आज

 

नहीं , मैं नहीं जाउंगा

उस दुकानदार के पास ,जाने क्या सोंचेगा

ना भी तो कह सकता है कमबख्त , कोई सबूत नहीं

मेंरे पास कि मैं हीं मरद हूं उनका

 

औरत बेवकूफ हो ,

तो ऐसा हीं होता है...समान रख के जाती तो

क्या बिगड जाता..अब किस मित्र का

खटखटाऊं दरवाजा

कहूं-उधार दो

पत्नी घर में नहीं है आज

 

क्या करूं मैं

पत्नी घर में नहीं और रूपए भी नहीं

और समान जरूरी -कहीं तो जाना हीं होगा

इस घर के लिए आज

 

अरे !

यह तो मैं सोच भी नहीं सकता था कि

दुकानदार चलकर आएगा मेरे घर , कहेगा -नमस्कार

वो जो आपकी मैडम हैं , बोल गई थीं कुछ सामान

रजिस्टर को भी देख लें , इसमें लिखा है

आपका हीं नाम....

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