रविवार, 6 मार्च 2016

तुम



तुम
चूल्हा फूंकते
झूकी हुई पीठ हो तुम

गोयठे की मद्धिम ऑच पर
रात को
रोटियों सी गोल करती तुम

सघन वृक्ष की टहनी
विनम्र नदी की गरम सॉस हो तुम

पहाड़ी रातों सी यातना के बाद
नींद की खुशी हो तुम...

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें